IIT Bombay Waste to Energy Project: बगीचे के कचरे से पक रहा 1200 छात्रों का खाना !

IIT Bombay Waste to Energy Project: बगीचे के कचरे से पक रहा 1200 छात्रों का खाना !

 


IIT Bombay Waste to Energy Project: बगीचे के कचरे से पक रहा 1200 छात्रों का खाना

IIT बॉम्बे का कमाल! बगीचे के कचरे से पक रहा है 1,200 विद्यार्थियों का खाना, LPG की खपत में 60% की कमी

जिस कचरे को हटाने के लिए हर साल ₹50 लाख खर्च होते थे, अब उसी कचरे से रसोई का ईंधन तैयार किया जा रहा है। IIT बॉम्बे की यह पहल देश के दूसरे शैक्षणिक संस्थानों और शहरों के लिए भी एक शानदार उदाहरण बन सकती है।

आमतौर पर हम बगीचे से निकलने वाली सूखी पत्तियों, टहनियों और दूसरे जैविक कचरे को बेकार समझते हैं। नगरपालिकाएं और संस्थान इस कचरे को इकट्ठा करके ठिकाने लगाने में लाखों रुपये खर्च करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसी कचरे से हजारों लोगों का खाना भी पकाया जा सकता है?

मुंबई स्थित प्रतिष्ठित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे ने कुछ ऐसा ही करके दिखाया है।

संस्थान के परिसर में रोजाना लगभग 2 टन बगीचे का कचरा पैदा होता है। पहले इस कचरे को परिसर से बाहर ले जाने और उसके निपटान पर सालाना करीब 50 लाख रुपये खर्च होते थे। अब इसी कचरे को उपयोगी ईंधन में बदलकर हॉस्टल की रसोई में इस्तेमाल किया जा रहा है।

इस पहल के तहत हॉस्टल नंबर 16 की रसोई में 1,200 से अधिक विद्यार्थियों के लिए भोजन तैयार करने में इस वैकल्पिक ईंधन का उपयोग हो रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, इससे रसोई में LPG की खपत लगभग 60 प्रतिशत तक कम हुई है।

आखिर कैसे कचरे से तैयार हो रहा है रसोई का ईंधन?

यह तकनीक सुनने में जितनी दिलचस्प है, उतनी ही उपयोगी भी है।

सबसे पहले परिसर से निकलने वाली सूखी पत्तियों, टहनियों और बगीचे के जैविक कचरे को इकट्ठा किया जाता है। इसके बाद उसे सुखाकर और विशेष मशीनों की मदद से दबाकर छोटे-छोटे ठोस टुकड़ों में बदला जाता है। इन्हें बायोमास फ्यूल पेलेट्स कहा जाता है।

इसके बाद इन पेलेट्स को एक विशेष मशीन में सीमित ऑक्सीजन के साथ गर्म किया जाता है। इस प्रक्रिया को गैसीफिकेशन कहते हैं। इससे ज्वलनशील गैस तैयार होती है, जिसका उपयोग रसोई में गर्मी और भाप पैदा करने के लिए किया जाता है।

इस तरह जिस कचरे को पहले बेकार समझकर हटाया जाता था, वही अब हजारों विद्यार्थियों के भोजन बनाने में मदद कर रहा है।


इसके पीछे किसका दिमाग है?

इस तकनीक के विकास की कहानी भी काफी दिलचस्प है।
IIT बॉम्बे में इस दिशा में शोध की शुरुआत वर्ष 2014 में केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर संजय महाजनी के नेतृत्व में हुई थी। इस तकनीक को विकसित करने में प्रोफेसर संदीप कुमार का भी योगदान रहा।
बाद में इस तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर आगे बढ़ाने के लिए IIT बॉम्बे से जुड़ी स्टार्टअप कंपनी Infixen Energy Pvt. Ltd. को लाइसेंस दिया गया। अब इसी तकनीक की मदद से परिसर के जैविक कचरे का ऊर्जा के रूप में उपयोग किया जा रहा है।

एक साथ तीन बड़े फायदे

इस परियोजना की सबसे अच्छी बात यह है कि इससे एक नहीं, बल्कि कई समस्याओं का समाधान निकलता है।

1. कचरे का उपयोगी प्रबंधन: रोजाना पैदा होने वाले लगभग 2 टन बगीचे के कचरे को उपयोगी संसाधन में बदला जा रहा है।

2. ईंधन की बचत: LPG पर निर्भरता कम होने से रसोई के संचालन का खर्च घटाने में मदद मिल रही है।

3. पर्यावरण को फायदा: जैविक कचरे का बेहतर उपयोग होने से उसे बेकार फेंकने या खुले में जलाने की जरूरत कम हो सकती है।

इसके अलावा, पहले कचरे को बाहर ले जाने पर होने वाला भारी परिवहन खर्च भी बचाया जा सकता है।

देश के दूसरे संस्थानों को भी इससे सीखने की जरूरत.

भारत में बड़े-बड़े कॉलेज, विश्वविद्यालय, अस्पताल, होटल और सरकारी संस्थान हैं। इनमें से अधिकांश जगहों पर रोजाना भारी मात्रा में बगीचे का कचरा और दूसरे जैविक अवशेष निकलते हैं।

यदि इन संस्थानों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ऐसी तकनीक अपनाई जाए, तो कचरे के प्रबंधन के साथ-साथ ऊर्जा की जरूरत का एक हिस्सा भी पूरा किया जा सकता है।
हालांकि, हर जगह इस मॉडल को लागू करने से पहले कचरे की उपलब्धता, मशीनों की लागत, रखरखाव और ईंधन उत्पादन की क्षमता का आकलन करना जरूरी होगा।

असली बदलाव सोच में होना चाहिए!

IIT बॉम्बे की यह पहल हमें एक बहुत साधारण लेकिन महत्वपूर्ण बात समझाती है। हर समस्या का समाधान हमेशा नए संसाधन जुटाने में नहीं होता। कई बार हमारे आसपास मौजूद संसाधनों का सही इस्तेमाल करना ही सबसे बेहतर समाधान बन जाता है।
हमारे यहां कचरे के निपटान पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। शहरों में पत्तियां जलाई जाती हैं, खेतों में कृषि अवशेषों को बेकार समझा जाता है और दूसरी तरफ ऊर्जा के लिए महंगे ईंधन पर निर्भरता बनी रहती है।
ऐसे में IIT बॉम्बे का यह प्रयोग केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि संसाधनों के प्रति हमारी सोच बदलने का उदाहरण है।

जिसे हम कचरा समझकर फेंक देते हैं, वही किसी की जरूरत पूरी करने वाला संसाधन बन सकता है। जरूरत है तो बस समस्या को देखने का नजरिया बदलने और सही तकनीक अपनाने की।
भारत को केवल बड़ी-बड़ी योजनाओं की नहीं, बल्कि ऐसे व्यावहारिक और जमीन पर परिणाम देने वाले प्रयोगों की भी जरूरत है।

IIT बॉम्बे की यह पहल इसी दिशा में एक सराहनीय कदम है।

प्रोजेक्ट की आधिकारिक जानकारी:
IIT Bombay – From Campus Waste to Clean Energy


Ganesh Avasthi

Ganesh K Avasthi
Blog Admin


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