प्रतिष्ठित पशुबुद्धि: विवेक खोते हुवे समाज का कड़वा सच !
अगर आप जाति-धर्म-पंथ-प्रांत-भाषा-रंग-धन-शरीर-विचार आदि के आधार पर किसी से द्वेष करते हैं, या खुद को श्रेष्ठ/ऊँचा समझते हैं और सामने वाले व्यक्ति को निम्न/नीचा समझते हैं, तो यकीन मानिए आप पशु-बुद्धि से ग्रस्त हैं! झुंड-मानसिकता वाले पशु! भले आप समाज में प्रतिष्ठित-सम्मानित क्यों न हों, ज्यादा से ज्यादा आप प्रतिष्ठित पशु-बुद्धि हैं! वैसे भी ऐसे व्यक्तित्व और चरित्र के व्यक्ति को प्रतिष्ठा-इज्जत देने वाला समाज कौन-सा मानव-बुद्धि से चलता होगा?
पशु और मानव में सिर्फ और सिर्फ एक बोध से जन्मे विवेक का अंतर है! किसी पशु को कभी देखा है विवेक से विचार करते हुए कि उसने आज एक बच्चे को काटा, तो वह सही है या गलत? वह यह काम कर ही नहीं सकता और न ही इसका पाखंड कर सकता है! क्योंकि प्रकृति ने उसे वैसा बनाया है! वह अपने प्राकृतिक गुणों के साथ ही जीता है! लेकिन खुद को सबसे विकसित प्रजाति कहने वाले इंसान, उसे मिले हुए विवेकरूपी प्राकृतिक वरदान का इस्तेमाल अगर करते ही नहीं हैं, तो मानव के श्रेष्ठ प्रजाति होने का दावा पूर्णतः खोखला है! एक पाखंड है!
पशु अक्सर झुंड में पाए जाते हैं! एक ही प्रजाति के पशुओं के अनेक झुंड होते हैं। हर एक झुंड अपना इलाका तय करता है और उस इलाके की मालिकाना हक के ऐलान के लिए वह अपनी गंध इलाके की सीमाओं पर छोड़ता है! अगर किसी अलग झुंड का पशु उनके इलाके में प्रवेश करे, तो वे उसकी जान तक ले लेते हैं! इसके पीछे का मनोविज्ञान क्या है, पता है? जो मेरे झुंड का नहीं, वह हमारा दुश्मन!
क्या हम मनुष्यों ने भी ऐसे झुंड नहीं बनाए हैं? क्या हमारे झुंड का आधार जाति-धर्म-पंथ-संप्रदाय-प्रांत-भाषा-रंग-धन-शरीर-विचार आदि नहीं है? क्या हम हमसे अलग झुंड वाले को दुश्मन नहीं समझते हैं? कोई सोशल मीडिया रूपी झुंड का हिस्सा है, कोई अपने-अपने जाति-धर्म-पंथ-संप्रदाय आदि झुंड का हिस्सा है! सारे झुंडों को किसी ने अपने आर्थिक-राजनीतिक लाभ के लिए बनाए रखा है, और हम अपना विवेक छोड़कर इस झुंड का हिस्सा बनकर समाज में अपनी गंदगी फैला रहे हैं!
बोध से जन्मे विवेकरूपी प्राकृतिक वरदान का अगर हम इस्तेमाल नहीं करते हैं, तो प्रेम-दया-करुणा-क्षमा-शांति-सद्भाव-समता-बंधुता की शिक्षा का दावा करने वाले सारे धार्मिक स्थल, ग्रंथ, महान कार्य करने वाले मानवों की मूर्तियाँ और संतों के वचन — इन सबका कोई अर्थ ही नहीं!
इन्हें सिर्फ प्रतीकों के रूप में अपने पशु-बुद्धि ग्रस्त माथे पर रखकर अपने अहंकार को पुष्ट कर लेने से आप मानव नहीं बनेंगे!आज सोते समय अपने विवेक को जगाते हुए एक सवाल खुद से पूछिएगा कि क्या मैंने जाति-धर्म-पंथ-प्रांत-भाषा-रंग-धन-शरीर-विचार के आधार पर नफरत के बीज बोए? अगर हाँ, तो मुझे उससे क्या लाभ हुआ?
झुंड से अपने को अलग कर विवेक से यह जरूर सोचना चाहिए — मेरा मानव होना जरूरी है या झुंड का हिस्सा होना? यह आत्म-निरीक्षण करने के लिए पहले अपनी पशु-बुद्धि को छोड़ना होगा, क्योंकि यह बड़े ईमानदारी का काम है और इसके लिए बड़े साहस की आवश्यकता है!


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